
उनकी आँखों में छलकता दर्द,
लरजते आंसू,बिखरते शब्द
मानों कुछ कह रहे है
मगर लब साथ नहीं दे रहे,
लड़खड़ाते कदम, मुरझाया बदन,
सिमटती सांसे,धड़कता दिल
मानों कुछ कह रहा है, मगर किसे कहे,
तड़फते अरमान, अनसुलझे सवाल,
दबी-दबी आह, सूनी-सूनी राह
मानों ढूँढ रही है किसी अपने को
मगर कोई अपना नहीं,
वो बेबसी और लाचारी से निहार रहे है,
सामने बने बंगले की ओर,
भींग रही है आँखों की कोर,
सबसे बेख़बर कि कोई
उनके चेहरे पर उभरती हुई
संवेदनाओ को बड़ी संजीदगी से देख रहा है,
मेरा अंतर्मन तड़फ उठा, मै पास गई ओर बोली-
बाबा आप तन्हा ओर खामोश कब से
उस बंगले की ओर उम्मीद लगाये बैठे है,
क्या जान सकती हूँ.. मै दर्द आपका ?
बाबा ने ख़ामोशी तोड़ी और
एक लम्बी आह भरके बोले..
बेटा वो बंगला कभी मेरा था,
जिसमे खुशियों का बसेरा था,
मेहनत से बच्चों को पाला था,
बिन माँ के ही संभाला था,
लेकिन आज वक़्त ये आया है,
अपनों से ही धोखा खाया है,
सोच रहा हूँ.. क्या इसी दिन के लिए
इंसान औलाद चाहता है,
उनकी खुशियों की खातिर
खुद की खुशियाँ लुटाता है,
आंसू छलक पड़े बूढ़ी आँखों से,
लाठी लुढ़क गई हाथो से, बोले-
अगर बुढ़ापे का अंजाम है यही तो
आख़िर क्यों चाहते है संतान सभी....
उनकी दर्द भरी दास्तां सुनकर
मै निरुत्तर हो गई .....